Biography of Maharana Pratap | महाराणा प्रताप की जीवन कथा

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Biography of Maharana Pratap में आप पढ़ने जा रहे है। महाराणा प्रताप का जीवन परिचय, इनकी वीरता से भारत भूमि गौरवान्वित है। Maharana pratap history in hindi महाराणा प्रताप का इतिहास।

Biography of Maharana Pratap

महाराणा प्रताप को राजपूत वीरता और दृढ़ता की एक मिसाल माना जाता है। उन्हें एक ऐसे राजा के रूप में जाना जाता है जो विषम से विषम परिस्थिति में भी किसी के आगे नहीं झुके। शत्रु के सामने सिर्फ महाराणा प्रताप का नाम लेने भर से सेना के पसीने छूट जाते थे। महाराणा प्रताप को जितना उनकी बहादुरी के लिए जाना जाता है उतना ही उनकी दरियादिली और प्रजा व राज्य से प्रेम के लिए जाना जाता है। बताया जाता है कि महाराणा प्रताप ने कभी भी निहत्थे दुश्मन पर वार नहीं किया वे हमेशा अपने साथ एक अतिरिक्त तलवार रखते थे।

आइए जानते हैं भारत के महान शासक के इतिहास, जीवन परिचय, युद्ध तथा उनके शौर्य से जुड़ी कुछ कहानियां:-

कौन थे महाराणा प्रताप:-

महाराणा प्रताप मेवाड़ के एक महान हिंदू शासक थे। वे उदयपुर मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उस समय परिस्थितियों के अधीन होकर सभी हिंदू शासकों ने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी लेकिन महाराणा प्रताप ही ऐसे वीर थे जिन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। हिंदू कुल के गौरव को सुरक्षित करने में वे सदा तत्पर रहे।

महाराणा प्रताप जयंती:-

महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। प्रताप की जयंती के मौके पर देशभर में विभिन्न तरह के आयोजन किए जाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पण की जाती है। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी वर्ष के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई,1540 को हुआ था, इसीलिए उस दिन हिंदू तारीख के अनुसार ज्येष्ठ मास की तृतीया तिथि थी इसीलिए बहुत सी जगह 9 मई को उनकी जयंती मनाई जाती है।

महाराणा प्रताप की जीवनी:-

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ईसा पूर्व राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराजा उदय सिंह और माता रानी जी जयवंताबाई थी। वे राणा सांगा के पौत्र थे। महाराणा प्रताप को बचपन में सभी कीका नाम लेकर पुकारा करते थे। पिता उदयसिंह की मृत्यु के बाद राजपूत सरदारों ने मिलकर साल 1576 को महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठा दिया। मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने कई प्रयास किए। अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप भी अन्य राजाओं की तरह उसके कदमों में झुक जाए, लेकिन महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

महाराणा प्रताप ने अपने जीवन काल में कुल 11 शादियां की थी। कहा जाता है कि उन्होंने यह सभी शादियां राजनीतिक कारणों से की थी। महाराणा प्रताप के 17 बेटे और पांच बेटियां थी। महारानी अजबदे से पैदा हुए अमर सिंह उनके उत्तराधिकारी बने।

महाराणा प्रताप के पिता उन्हें अपनी तरह कुशल योद्धा बनाना चाहते थे इसीलिए महाराणा प्रताप को बचपन में ही ढाल, तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। बालक प्रताप ने कम उम्र में ही अपने अदम्य साहस का परिचय दे दिया था। धीरे-धीरे समय बीतता गया। इसी बीच वे अस्त्र शस्त्र चलाने में निपुण हो गए थे।

जब महाराणा प्रताप को अपने पिता के सिंहासन पर बैठाया गया तो उनके भाई जगमाल सिंह ने बदला लेने के लिए मुगल सेना में शामिल होकर बगावत कर दी। मुगल राजा अकबर ने उसके द्वारा प्रदान की गई जानकारी और सहायता के कारण उसे जयपुर शहर की सल्तनत पुरस्कार के रूप में दे दी। जब राजपूतों ने चित्तौड़ को छोड़ दिया तो मुगलों ने उस जगह पर नियंत्रण कर लिया, लेकिन मेवाड़ राज्य को वह अपने अधीन करने में असफल रहे।

अकबर द्वारा कई दूत भेजे गए जिन्होंने एक गठबंधन प्रस्ताव के साथ बातचीत करने की कोशिश की लेकिन कुछ काम नहीं आया। 1573 में छह दूत संधि करने के लिए अकबर द्वारा भेजे गए लेकिन महाराणा प्रताप द्वारा सब ठुकरा दिए गए। जब शांति संधि पर हस्ताक्षर करने के प्रयास विफल हो गए तो अकबर ने अपनी शक्तिशाली मुगल सेना के साथ लड़ने की कोशिश करने का मन बना लिया।

अकबर की सेना में 80000 सैनिक थे वहीं दूसरी तरफ महाराणा प्रताप की राजपूती सेना संख्या में सिर्फ 20000 थी। यह युद्ध भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण युद्ध था। इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध में ना तो कोई विजय हुआ न ही किसी की पराजय हुई। क्योंकि अकबर की सेना बहुत विशाल थी उसके सामने 20000 की सेना थी इसके बावजूद वह महाराणा प्रताप को बंदी नहीं बना पाए थे। हार के बावजूद महाराणा प्रताप ने अपना मनोबल कमजोर नहीं होने दिया और आखिरकार अपने खोए हुए चितौड को पुनः प्राप्त किया।

महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े कुछ किस्से:-

चेतक की वीरता:-

जब जब महाराणा प्रताप का नाम लिया जाता है तब तब उनके प्रिय घोड़े चेतक का नाम भी लिया जाता है। स्वामी भक्ति ऐसी कि दुनिया में चेतक सर्वश्रेष्ठ अश्व माना गया। महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक इतना समझदार था कि दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए उसके सिर पर हाथी की सूंड लगाई जाती थी।

महाराणा प्रताप का प्रसिद्ध नीलवर्ण घोड़ा चेतक उनका अत्यंत प्रिय घोड़ा था। उसके चर्चे पूरे देश में थे। दरअसल महाराणा प्रताप के पास एक अरब व्यापारी अरबी नस्ल के तीन घोड़े लेकर आया था जिनके नाम चेतक, त्राटक एवं अटक थे। प्रताप ने घोड़ों का परीक्षण किया जिसमें चेतक और त्राटक सफल हुए। लेकिन महाराणा प्रताप ने चेतक को अपने पास रख लिया और त्राटक को छोटे भाई शक्ति सिंह को दे दिया।

हल्दीघाटी के युद्ध में बिना किसी सैनिक के राणा अपने पराक्रमी चेतक पर सवार होकर पहाड़ की ओर चल पड़े। उनके पीछे दो मुगल सैनिक लगे हुए थे परंतु चेतक ने अपना पराक्रम दिखाते हुए रास्ते में एक पहाड़ी बहते हुए नाले को लाँघकर प्रताप को बचाया जिसे मुगल सैनिक पार नहीं कर सके। चेतक द्वारा लगाई गई यह छलांग इतिहास में अमर हो गई। इस छलाँग को विश्व इतिहास में नायाब माना जाता है।

चेतक ने नाला तो लाँघ लिया पर अब उसकी गति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी, पीछे से मुगलों के घोड़ों की टापे भी सुनाई पड़ रही थी। उसी समय प्रताप को अपनी मातृभाषा में आवाज सुनाई पड़ी-‘नीला घोड़ा रा असवार’ प्रताप ने पीछे पलट कर देखा तो उन्हें एक अश्वारोही दिखाई पड़ा और वह था -उनका सगा भाई शक्ति सिंह। प्रताप के साथ व्यक्तिगत मतभेद ने उसे देशद्रोही बनाकर अकबर का सहयोगी बना दिया था और युद्ध स्थल पर वह मुगल पक्ष की तरफ से लड़ता था। उसने नीले घोड़े को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ जाते हुए देखा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा परंतु केवल दोनों मुगलों को यमलोक पहुंचाने के लिए। जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले मिले थे।

इस बीच चेतक इमली के पेड़ के पास गिर पड़ा यहीं से शक्ति सिंह ने प्रताप को अपने घोड़े पर भेजा और वह खुद चेतक के पास रुके रहे। कहते हैं कि यहीं पर चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए। चेतक लंगड़ा (खोड़ा) हो गया था इसीलिए पेड़ का नाम भी खोड़ी इमली हो गया। कहते हैं इमली के पेड़ का यह ठूँठ आज भी हल्दीघाटी में उपस्थित है।

महाराणा प्रताप का हाथी:-

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा लेकिन उनका एक हाथी भी था। उसका नाम था-राम प्रसाद। उनके इस हाथी का उल्लेख अल बदायूनी जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था उसने अपने ग्रंथ में किया है। वह लिखता है कि जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढ़ाई की थी तब उसने दो चीजों को ही बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी राम प्रसाद।

वह हाथी इतना समझदार व ताकतवर था कि उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था। हाथी को पकड़ने के लिए अकबर की सेना ने छः सात हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतों को बिठाया तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाए। अकबर के समक्ष पेश किया गया जहां अकबर ने उसका नाम पीर प्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामी भक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का ना ही दाना खाया और ना ही पानी पीया और वह शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि जिसके हाथी को मैं मेरे सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाऊंगा।

भाग खड़ी हुई अकबर की सेना:-

महाराणा प्रताप का जन्म कुंभलगढ़ के किले में हुआ था। यह किला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों की रेंज अरावली की एक पहाड़ी पर है। महाराणा का पालन पोषण भी भीलों की कीका जाति ने किया था। भील राणा से बहुत प्यार करते थे। जब अकबर की सेना ने कुंभलगढ़ को घेर लिया तो भीलों ने जमकर लड़ाई की और 3 महीने तक अकबर की सेना को रोके रखा। एक दुर्घटना के चलते किले के पानी का स्रोत गंदा हो गया जिसके बाद कुछ दिनों के लिए महाराणा को किला छोड़ना पड़ा और अकबर की सेना का वहां कब्जा हो गया लेकिन अकबर की सेना ज्यादा दिन तक वहाँ टिक नहीं सकी और फिर से कुंभलगढ़ पर महाराणा का अधिकार हो गया।

हल्दीघाटी का युद्ध:-

हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून,1576 ईस्वी को लड़ा गया था। यह युद्ध हल्दीघाटी में लड़ा गया , इसीलिए इसे हल्दीघाटी का युद्ध कहते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यह कोई आम युद्ध नहीं था बल्कि अकबर और महाराणा के बीच लड़ा गया यह युद्ध महाभारत के युद्ध की तरह विनाशकारी था।

18 जून,1576 को हल्दीघाटी के मैदान में मुगलों की तरफ से आसिफ खान और राजपूतों की तरफ से मान सिंह के नेतृत्व में दोनों सेनाएँ आमने सामने खड़ी हुई। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे जबकि मुगलों के पास 80000 सैनिक। इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे। हल्दीघाटी की लड़ाई 4 घंटे तक चली और इस लड़ाई में मेवाड़ के लगभग 600 सैनिक मारे गए जबकि मुगलों ने अपने सिर्फ 150 सैनिक खोए और 350 सैनिक घायल हो गए।

महाराणा प्रताप भी बुरी तरह से घायल हो गए और भागकर पहाड़ियों में छिप गए। मुगलों ने अरावली को छोड़कर मेवाड़ के कई हिस्सों पर अपना कब्जा कर लिया। लेकिन वह महाराणा प्रताप को पकड़ने में कामयाब नहीं हो सके। उसके बाद जंगलों में रहकर महाराणा प्रताप ने अपनी गोरिल्ला रणनीति के माध्यम से मुगलों को परेशान करना जारी रखा।

जंगलों में रहने के दौरान उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था तो वह घास की रोटियां खाया करते थे। वे हर तरह की विषम परिस्थिति को झेलते हुए अपनी सेना तैयार करते रहे। जब कुछ समय बाद अकबर का ध्यान चित्तौड़ से हट गया और वह लाहौर की तरह बढ़ गया क्योंकि उसे अपने उत्तर पश्चिम वाले क्षेत्र पर भी नजर रखनी थी।

इसी का फायदा उठाकर महाराणा प्रताप ने पश्चिमी मेवाड़ पर अपना कब्जा कर लिया जिसमें कुंभलगढ़, उदयपुर और गोकुंडा आदि शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में ना तो अकबर जीत सका और ना ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो महाराणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। दोनों ओर से बराबरी की टक्कर के चलते युद्ध का कोई परिणाम हासिल ना हो सका था।

महाराणा प्रताप का भाला:-

सोलहवीं शताब्दी के राजपूत शासकों में महाराणा प्रताप ऐसे शासक थे जो अकबर को लगातार टक्कर देते रहे। उस समय के जानकार बताते हैं कि महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और कद 7 फीट 5 इंच था। वे बेहद फुर्तीले और साहसी थे। महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो के वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था। उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। इतने भार को लेकर वे चेतक पर बैठकर हवा की गति से चलते थे। प्रताप के हथियार इतिहास के सबसे भारी युद्ध हथियारों में शामिल है। महाराणा प्रताप की तलवार, कवच आदि सामान आज भी उदयपुर राजघराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

जीवन परिचय-

नाम          महाराणा प्रताप
उपनाम          प्रताप सिंह
जन्मतिथि       9 मई,1540
जन्मस्थान      कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजस्थान,भारत
पिता              उदय सिंह
माता             महारानी जयवन्ताबाई
धर्म               हिन्दू
उत्तराधिकारी  अमर सिंह प्रथम
मृत्यु              19 जनवरी,1597(56)
शासन काल    1568-1597

महाराणा प्रताप ऐसे शूरवीर थे जो अपनी मातृभूमि की रक्षा और आजादी के लिए पूरे जीवन लड़ते रहे। उन्होंने अपने जीवन में तमाम कष्ट सहन करते हुए भी पूरे देश के सामने स्वतंत्रता,स्वाभिमान और एक सच्चे देशभक्त की मिसाल पेश की और भारत की धरती को गौरवान्वित किया।

Written by:- Minakshi Kundu
Image credit:- canva.com


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